योग वशिष्ठ | Yoga Vasishtha PDF in Hindi

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योग वशिष्ठ | Yoga Vasishtha in Hindi

दोस्तों आज हम आपके लिए लेकर आएं हैं Yoga Vasishtha Hindi PDF / योग वशिष्ठ हिंदी पीडीएफ। गीता में स्वयं भगवान मनुष्य को उपदेश देते हैं जबकि ‘योग वासिष्ठ’ में नर (गुरु वसिष्ठ) नारायण (श्रीराम) को उपदेश देते हैं। विद्वत्जनों के अनुसार सुख और दुख, जरा और मृत्यु, जीवन और जगत, जड़ और चेतन, लोक और परलोक, बंधन और मोक्ष, ब्रह्म और जीव, आत्मा और परमात्मा, आत्मज्ञान और अज्ञान, सत् और असत्, मन और इंद्रियाँ, धारणा और वासना आदि विषयों पर कदाचित् ही कोई ग्रंथ हो जिसमें ‘योग वासिष्ठ’ की अपेक्षा अधिक गंभीर चिंतन तथा सूक्ष्म विश्लेषण हुआ हो। इस योग वशिष्ठ गीता प्रेस PDF में आपको बहुत सी अद्भुत बातें पढ़ने को मिलेंगी। इस पोस्ट में आप बड़ी आसानी से Yoga Vasishtha Hindi PDF / योग वशिष्ठ हिंदी पीडीएफ डाउनलोड कर सकते हैं।

योग वशिष्ठ हिंदी पीडीएफ | Yoga Vasishtha Hindi PDF

जिस किसी का चित्त एक क्षण के लिए भी ‘आत्मतत्व’ में स्थित हो जाता है तो वह अवस्था ही उसकी अत्यंत समाधि कहलाती है। ऐसा योग वशिष्ठ में कहा गया है। जिसका भी चित्त नित्य प्रबुद्ध है। वह अपने सारे कार्य करते हुए भी आत्मतत्व का रसास्वादन करता हुआ सर्वथा ही समाधि यज्ञ है अथवा समाधि में रमा हुआ रहता है।

लेकिन जो पद्मासन मुद्रा मे स्थित होकर ब्रह्मांजली कर में लिए हुए अपने चित्त को आत्मपद में लीन नहीं कर पाते है उन्हें किसी भी समय विश्रांति नहीं मिलती और न ही समाधि में स्थित हो पाते है। जिसका चित्त सदैव शांत और समाहित नित्य तृप्त है जो सदा ही अनुभव करता है। अथवा उसे ज्यों का त्यों रूप में भान हो जाता है वही सदा सर्वदा समाधि में स्थित रहता है।

जो पुरुष अपनी जागृत अवस्था या सुप्त अवस्था में भी उस परम तत्व का सदैव चिंतन करता है। या जागृत अवस्था में अपने कार्य को करते हुए भी परम तत्व में लीन रहता है उसे ही सदा समाधिस्थ समझना चाहिए।

जिस प्रकार से नदी के प्रचंड वेग को कोई भी रोक नहीं सकता उसी प्रकार समाधिस्थ को भी रोकने का प्रयास विफल हो जाता है क्योंकि कोई भी अपने परमानंद को छोड़ना नहीं चाहता है। जिस प्रकार गूंगे को गुड़ का स्वाद मिलने पर वह किसी को बता नहीं सकता उसी तरह ज्ञानी पुरुष अपनी समाधि की अवस्था को नहीं बता सकता उसे सिर्फ और सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। जैसे एक माता अपने छोटे बालक का सुख जान सकती है उसी तरह समाधि और शांति की अवस्था भी होती है।

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