वैदिक गणित के 17 सूत्र PDF

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वैदिक गणित के 17 सूत्र PDF Summary

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वैदिक गणित के माध्यम से कठिन से कठिनतम प्रश्नों को अत्यधिक सरलता एवं शीघ्रता से हल कर सकते हैं। वैदिक गणित आधुनिक गणित से बहुत अलग है। इसमें प्रयोग होने वाले सूत्र प्राचीन एवं प्रामाणिक हैं। यदि आप भी गणित में अच्छे अंक प्राप्त करना चाहते हैं तथा सफलतापूर्वक गणित सीखना चाहते हैं तो वैदिक गणित सीखें।

वैदिक गणित के 17 सूत्र pdf download / Vaidik Ganit Ke 17 Sutra in Hindi PDF

कर्मांक

सूत्र

1. एकाधिकेन पूर्वेण
2. निखिलं नवतश्चरमं दशतः
3. ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्
4. परावर्त्य योजयेत्
5. शून्यं साम्यसमुच्चये
6. (आनुरूप्ये) शून्यमन्यत्
7. संकलनव्यवकलनाभ्याम्
8. पूरणापूरणाभ्याम्
9. चलनकलनाभ्याम्
10. यावदूनम्
11. व्यष्टिसमष्टिः
12. शेषाण्यंकेन चरमेण
13. सोपान्त्यद्वयमन्त्च्यम्
14. एकन्यूनेन पूर्वेण
15. गुणितसमुच्चयः
16. गुणकसमुच्चयः

वैदिक गणित के उपसूत्र

कर्मांक

उपसूत्र

1. आनुरूप्येण
2. शिष्यते शेषसंज्ञः
3. आधमाधेनान्त्यमन्त्येन
4. केवलैः सप्तकं गुण्यात्
5. वेष्टनम्
6. यावदूनं तावदूनं
7. यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्गं च योजयेत्
8. अन्त्ययोर्द्दशकेऽपि
9. अन्त्ययोरेव
10. समुच्चयगुणितः
11. लोपनस्थापनाभ्यां
12. विलोकनं
13. गुणितसमुच्चयः समुच्चयगुणितः
14. ध्वजांक

1. एकाधिकेन पूर्वेण

अर्थ: पूर्व वाले से एक अधिक

प्रयोग: आवर्ती दशमलव भिन्न (recurring decimal fraction),वर्ग ज्ञात करने में,आंशिक भिन्नों द्वारा समाकलन (integration by using partial fractions)।

2. निखिलं नवतः चरमं दशतः

अर्थ: सभी 9 में से, अंत वाला 10 में से

प्रयोग: संख्याओं के गुणा और भाग में,रेखांक ज्ञात करने में।

3. ऊर्ध्व-तिर्यग्भ्याम् (vertically and crosswise):

अर्थ: सीधा/ऊर्ध्वाधर और तिरछा/तिर्यक

प्रयोग: संख्याओं के गुणा,बीजगणितीय[algebraic] गुणा ,साथ ही इनके भाग में भी,वर्गमूल ज्ञात करने में।

4. परावर्त्य योजयेत् (transpose and apply):

अर्थ: पक्षान्तरण तथा अनुप्रयोग

प्रयोग: भाग करने में,जटिल समीकरणों को हल करने में।

5. शून्यं साम्यसमुच्चये

अर्थ: जब समुच्चय एक समान है तब उस समुच्चय का मान शून्य होता है. सामान्य समीकरणों को आसानी से हल करने में अच्छा है यह सूत्र. यहाँ समुच्चय के 6 अर्थ निकलते हैं। जिनके बारे में आगे बताया जायेगा।

प्रयोग: सरल समीकरणों को हल करने में।

6. (आनुरूप्ये) शून्यंमन्यत्

अर्थ: प्रयोग में इसका अर्थ है -यदि एक अनुपात में है तो दूसरा शून्य है. प्रयोग:एक विशिस्ट प्रकार के युगपत[simultaneous] सरल समीकरण को हल करने में।

7. संकलन व्यवकलनाभ्याम्

अर्थ: जोड़ने तथा घटाने द्वारा

प्रयोग: वैसे युगपत समी० को हल करने में ,जिनमे x-गुणांक तथा y-गुणांक अदल-बदल कर दिए हों।

8. पूरणापूरणाभ्याम्

अर्थ: पूर्ण या अपूर्ण(बिना पूर्ण) करने से।

प्रयोग: वर्ग,घन,चतुर्घात इत्यादि को पूर्ण करके या किये बिना समीकरणों को हल करने में। * पारंपरिक गणित में इसका प्रयोग पहले से ही किया जा रहा है(solution by completing square).

9. चलनकलनाभ्याम्

अर्थ: चलन-कलन की क्रियाओं द्वारा

प्रयोग: द्विघात समीकरणों को हल करने में। अन्य स्थानों में भी।

10. यावदूनम

अर्थ: जितने का विचलन(कमी/अधिकता)है/जितना कम है।

प्रयोग: किसी संख्या का घन निकालने में।

11. व्यष्टिसमष्टि

अर्थ: इसका प्रायोगिक अर्थ हो सकता है–समष्टि(समूह) से व्यष्टि(एकल) में बदलकर।

प्रयोग: चतुर्घात समीकरणों–जिनके LHS में दो द्विपदों के चतुर्घातों का योग रहता है और RHS में कोई निश्चित संख्या होता है–के गुणनखंडन करने में.

12. शेषाण्यङ्केन चरमेण

अर्थ: अवशेष को अंतिम अंक के द्वारा।

प्रयोग: विशेष भाग/दशमलव भिन्न की क्रियाओं में।

13. सोपान्त्यद्वयमन्त्यम्

अर्थ: अंतिम तथा उपान्तिम का दुगुना

प्रयोग: 1/A.B +1/A.C = 1/A.D +1/B.C के प्रकार के समीकरण हल करने में.(A,B,C,D समान्तर श्रेढ़ी में हैं)।

14. एकन्युनेन पूर्वेण

अर्थ: पूर्व वाले से एक कम द्वारा।

प्रयोग: उन संख्याओं के गुणन में प्रयुक्त होता है जिनके गुणक में सभी अंक 9 होते हैं।

15. गुणितसमुच्चय

इस सूत्र तथा अगले सूत्र में समुच्चय का अलग अलग अर्थ है और उसके साथ गुणित या अगले सूत्र में गुणक लगा है। हम सूत्र का प्रायोगिक अर्थ देखेंगे।

16. गुणक समुच्चय

अर्थ: यदि द्विघात व्यंजक दो द्विपदों (x+a) तथा (x+b) का गुणनफल है,तब इसका प्रथम अवकलन दोनों गुणनखण्डों का योग होता है आदि आदि*।(if and when a quadratic expression is the product of the binomials (x+a) and (x+b), its first differential is the sum of the said two factors and so on.) प्रयोग: गुणनखंडन करने में और अवकल(differentiation) ज्ञात करने में।

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