शिव चालीसा | Shiv Chalisa PDF in Hindi

शिव चालीसा | Shiv Chalisa Hindi PDF Download

शिव चालीसा | Shiv Chalisa in Hindi PDF download link is given at the bottom of this article. You can direct download PDF of शिव चालीसा | Shiv Chalisa in Hindi for free using the download button.

Tags:

शिव चालीसा | Shiv Chalisa Hindi PDF Summary

दोस्तों आज हम आपके लिए लेकर आये हैं शिव चालीसा PDF / Shiv Chalisa PDF in Hindi जिसमे आपको भगवान शिव की आरती पूजा विधि मंत्र व बहुत कुछ पढ़ने को मिलेगा। शिव जी को भोलेनाथ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि वह शीघ्र ही भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं। भगवान् भोलेनाथ को प्रसन्न करने हेतु प्रतिदिन शिव चालीसा का पाठ करना चाहिये। इस शिव चालीसा गीता प्रेस गोरखपुर PDF में आपको शिव जी को प्रसन्न करने का सबसे सरल मंत्र मिलेगा। इस लेख में हम आपको विस्तार से बातएंगे की शिव चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है। शिव चालीसा का अर्थ जानने हेतु भी आप इस लेख को पढ़ सकते हैं। भगवान् शिव को समर्पित इस दिव्य शिव चालीसा के फायदे जानकार आप भी इसका पाठ किये बिना नहीं रह पाएंगे। इस पोस्ट में आप बड़ी आसानी से शिव चालीसा हिंदी अर्थ सहित PDF / Shiv Chalisa in Hindi PDF डाउनलोड कर सकते हैं सिर्फ एक क्लिक में।

शिव चालीसा PDF | Shiv Chalisa PDF in Hindi

श्री शिव चालीसा पढ़ने से पहले दोहा पढ़ा जाता है जो इस प्रकार है।
।। दोहा ।।
श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

हे गिरिजा पुत्र भगवान श्री गणेश आपकी जय हो। आप मंगलकारी हैं, विद्वता के दाता हैं, अयोध्यादास की प्रार्थना है प्रभु कि आप ऐसा वरदान दें जिससे सारे भय समाप्त हो जांए।

|| श्री शिव चालीसा चौपाई ||
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अर्थ:  हे गिरिजा पति हे, दीन हीन पर दया बरसाने वाले भगवान शिव आपकी जय हो, आप सदा संतो के प्रतिपालक रहे हैं। आपके मस्तक पर छोटा सा चंद्रमा शोभायमान है, आपने कानों में नागफनी के कुंडल डाल रखें हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

अर्थ: आपकी जटाओं से ही गंगा बहती है, आपके गले में मुंडमाल (माना जाता है भगवान शिव के गले में जो माला है उसके सभी शीष देवी सती के हैं, देवी सती का 108वां जन्म राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री के रुप में हुआ था। जब देवी सती के पिता प्रजापति ने भगवान शिव का अपमान किया तो उन्होंने यज्ञ के हवन कुंड में कुदकर अपनी जान दे दी तब भगवान शिव की मुंडमाला पूर्ण हुई। इसके बाद सती ने पार्वती के रुप में जन्म लिया व अमर हुई) है। बाघ की खाल के वस्त्र भी आपके तन पर जंच रहे हैं। आपकी छवि को देखकर नाग भी आकर्षित होते हैं।

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

अर्थ: माता मैनावंती की दुलारी अर्थात माता पार्वती जी आपके बांये अंग में हैं, उनकी छवि भी अलग से मन को हर्षित करती है, तात्पर्य है कि आपकी पत्नी के रुप में माता पार्वती भी पूजनीय हैं। आपके हाथों में त्रिशूल आपकी छवि को और भी आकर्षक बनाता है। आपने हमेशा शत्रुओं का नाश किया है।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

अर्थ: आपके सानिध्य में नंदी व गणेश सागर के बीच खिले कमल के समान दिखाई देते हैं। कार्तिकेय व अन्य गणों की उपस्थिति से आपकी छवि ऐसी बनती है, जिसका वर्णन कोई नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

अर्थ: हे भगवन, देवताओं ने जब भी आपको पुकारा है, तुरंत आपने उनके दुखों का निवारण किया। तारक जैसे राक्षस के उत्पात से परेशान देवताओं ने जब आपकी शरण ली, आपकी गुहार लगाई।

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

अर्थ: हे प्रभू आपने तुरंत तरकासुर को मारने के लिए षडानन (भगवान शिव व पार्वती के पुत्र कार्तिकेय) को भेजा। आपने ही जलंधर (श्रीमद‍्देवी भागवत् पुराण के अनुसार भगवान शिव के तेज से ही जलंधर पैदा हुआ था) नामक असुर का संहार किया। आपके कल्याणकारी यश को पूरा संसार जानता है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥

अर्थ: हे शिव शंकर भोलेनाथ आपने ही त्रिपुरासुर (तरकासुर के तीन पुत्रों ने ब्रह्मा की भक्ति कर उनसे तीन अभेद्य पुर मांगे जिस कारण उन्हें त्रिपुरासुर कहा गया। शर्त के अनुसार भगवान शिव ने अभिजित नक्षत्र में असंभव रथ पर सवार होकर असंभव बाण चलाकर उनका संहार किया था) के साथ युद्ध कर उनका संहार किया व सब पर अपनी कृपा की। हे भगवन भागीरथ के तप से प्रसन्न हो कर उनके पूर्वजों की आत्मा को शांति दिलाने की उनकी प्रतिज्ञा को आपने पूरा किया।

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

अर्थ: हे प्रभू आपके समान दानी और कोई नहीं है, सेवक आपकी सदा से प्रार्थना करते आए हैं। हे प्रभु आपका भेद सिर्फ आप ही जानते हैं, क्योंकि आप अनादि काल से विद्यमान हैं, आपके बारे में वर्णन नहीं किया जा सकता है, आप अकथ हैं। आपकी महिमा का गान करने में तो वेद भी समर्थ नहीं हैं।

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

अर्थ: हे प्रभु जब क्षीर सागर के मंथन में विष से भरा घड़ा निकला तो समस्त देवता व दैत्य भय से कांपने लगे (पौराणिक कथाओं के अनुसार सागर मंथन से निकला यह विष इतना खतरनाक था कि उसकी एक बूंद भी ब्रह्मांड के लिए विनाशकारी थी) आपने ही सब पर मेहर बरसाते हुए इस विष को अपने कंठ में धारण किया जिससे आपका नाम नीलकंठ हुआ।

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

अर्थ: हे नीलकंठ आपकी पूजा करके ही भगवान श्री रामचंद्र लंका को जीत कर उसे विभीषण को सौंपने में कामयाब हुए। इतना ही नहीं जब श्री राम मां शक्ति की पूजा कर रहे थे और सेवा में कमल अर्पण कर रहे थे, तो आपके ईशारे पर ही देवी ने उनकी परीक्षा लेते हुए एक कमल को छुपा लिया। अपनी पूजा को पूरा करने के लिए राजीवनयन भगवान राम ने, कमल की जगह अपनी आंख से पूजा संपन्न करने की ठानी, तब आप प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छित वर प्रदान किया।

जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

अर्थ: हे अनंत एवं नष्ट न होने वाले अविनाशी भगवान भोलेनाथ, सब पर कृपा करने वाले, सबके घट में वास करने वाले शिव शंभू, आपकी जय हो। हे प्रभु काम, क्रोध, मोह, लोभ, अंहकार जैसे तमाम दुष्ट मुझे सताते रहते हैं। इन्होंनें मुझे भ्रम में डाल दिया है, जिससे मुझे शांति नहीं मिल पाती। हे स्वामी, इस विनाशकारी स्थिति से मुझे उभार लो यही उचित अवसर। अर्थात जब मैं इस समय आपकी शरण में हूं, मुझे अपनी भक्ति में लीन कर मुझे मोहमाया से मुक्ति दिलाओ, सांसारिक कष्टों से उभारों। अपने त्रिशुल से इन तमाम दुष्टों का नाश कर दो। हे भोलेनाथ, आकर मुझे इन कष्टों से मुक्ति दिलाओ।

मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

अर्थ: हे प्रभु वैसे तो जगत के नातों में माता-पिता, भाई-बंधु, नाते-रिश्तेदार सब होते हैं, लेकिन विपदा पड़ने पर कोई भी साथ नहीं देता। हे स्वामी, बस आपकी ही आस है, आकर मेरे संकटों को हर लो। आपने सदा निर्धन को धन दिया है, जिसने जैसा फल चाहा, आपकी भक्ति से वैसा फल प्राप्त किया है। हम आपकी स्तुति, आपकी प्रार्थना किस विधि से करें अर्थात हम अज्ञानी है प्रभु, अगर आपकी पूजा करने में कोई चूक हुई हो तो हे स्वामी, हमें क्षमा कर देना।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥

अर्थ: हे शिव शंकर आप तो संकटों का नाश करने वाले हो, भक्तों का कल्याण व बाधाओं को दूर करने वाले हो योगी यति ऋषि मुनि सभी आपका ध्यान लगाते हैं। शारद नारद सभी आपको शीश नवाते हैं।

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥

अर्थ: हे भोलेनाथ आपको नमन है। जिसका ब्रह्मा आदि देवता भी भेद न जान सके, हे शिव आपकी जय हो। जो भी इस पाठ को मन लगाकर करेगा, शिव शम्भु उनकी रक्षा करेंगें, आपकी कृपा उन पर बरसेगी।

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥

अर्थ: पवित्र मन से इस पाठ को करने से भगवान शिव कर्ज में डूबे को भी समृद्ध बना देते हैं। यदि कोई संतान हीन हो तो उसकी इच्छा को भी भगवान शिव का प्रसाद निश्चित रुप से मिलता है। त्रयोदशी (चंद्रमास का तेरहवां दिन त्रयोदशी कहलाता है, हर चंद्रमास में दो त्रयोदशी आती हैं, एक कृष्ण पक्ष में व एक शुक्ल पक्ष में) को पंडित बुलाकर हवन करवाने, ध्यान करने और व्रत रखने से किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अर्थ: जो कोई भी धूप, दीप, नैवेद्य चढाकर भगवान शंकर के सामने इस पाठ को सुनाता है, भगवान भोलेनाथ उसके जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करते हैं। अंतकाल में भगवान शिव के धाम शिवपुर अर्थात स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उसे मोक्ष मिलता है। अयोध्यादास को प्रभु आपकी आस है, आप तो सबकुछ जानते हैं, इसलिए हमारे सारे दुख दूर करो भगवन।

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

बोलो शिव शंकर भगवान की जय ||

सम्पूर्ण श्री शिव चालीसा PDF हिन्दी में डाउनलोड करने के लिए नीचे दिये गए डाउनलोड बटन पर क्लिक करें और पाएँ श्री शिव चालीसा, श्री शिव आरती और पूजा विधि एक ही पीडीएफ़ में।

शिव चालीसा पाठ के लाभ व महत्व | Shiv Chalisa Benefits & Significance :

  • शिव चालीसा के नियमित पाठ से मनुष्य को अनेक प्रकार के लाभ होते हैं, यदि आप प्रतिदिन शिव चालीसा का पाठ नहीं कर सकते, तो प्रति सोमवार आपको किसी शिव मंदिर में इस चालीसा का पाठ अवश्य करें।
  • प्रतिदिन शिव मंदिर में शिवलिंग के समक्ष शिव चालीसा का पाठ करने से अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है।
  • गर्भवती स्त्रियों को शिव चालीसा पाठ अवश्य करना चाहिये, इससे भगवान शिव गर्भ में पल रहे शिशु की रक्षा करते हैं, तथा उसको स्वस्थ्य रखते हैं।
  • शिव चालीसा पाठ करने से शराब, तंबाकू, सिगरेट जैसे किसी भी प्रकार के नशे की लत से छुटकारा पाने में सहायता मिलती है।
  • जिन स्त्रियों के विवाह में व्यवधान उत्पन्न हो रहे हैं, उन्हें शिव चालीसा का पाठ करने से अत्यधिक लाभ होता है।
  • विवाहोपरान्त आने वाली समस्याओं को दूर रखने के लिए भी इस चालीसा का पाठ करना चाहिये।
  • गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति को शिव चालीसा के पाठ से लाभ मिलता है तथा यदि कोई छोटा बच्चा किसी रोग से पीड़ित है तो माता-पिता बच्चे की और से शिव चालीसा का पाठ कर सकते हैं।

शिव चालीसा पाठ विधि PDF | Shiv Chalisa Path Vidhi PDF in Hindi

  • सर्वप्रथम प्रातः स्नान आदि करके नित्यकर्म से निर्वत्त हो जायें।
  • अब श्वेत व स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • वस्त्रादि धारण करने के उपरान्त पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर पद्मासन में बैठ जायें।
  • अब शिवलिंग का शुद्ध जल अथवा गंगाजल से अभिषेक करें।
  • तत्पश्चात सफेद चन्दन, अक्षत (बिना टूटे चावल), गुड़हल के पीले पुष्प, सफेद आक के पुष्प शिव जी को अर्पित करें।
  • अब शिव जी के समक्ष धूप व देशी घी का दीप प्रज्ज्वलित करें।
  • तदोपरान्त पूर्ण भक्तिभाव से श्री शिव चालीसा का श्रद्धानुसार पाठ करें।
  • पाठ संपन्न होने पर शिवलिंग का गन्ने का रास से अभिषेक करें।
  • अब शिवलिंग पर भाँग व धतूरा चढ़ाएं।
  • तत्पश्चात देशी घी के दीपक से भगवान शिव की आरती करें।
  • अब शिवजी का आशीर्वाद ग्रहण कर अपने कुटुम्ब की कुशलता हेतु प्रार्थना करें।

शिव चालीसा हिंदी अर्थ सहित PDF | Shiv Chalisa in Hindi PDF

You may also like :

आप शिव चालीसा PDF / Shiv Chalisa PDF in Hindi को नीचे दिए हुए लिंक से निशुल्क डाउनलोड कर सकते हैं।

शिव चालीसा | Shiv Chalisa pdf

शिव चालीसा | Shiv Chalisa PDF Download Link

REPORT THISIf the download link of शिव चालीसा | Shiv Chalisa PDF is not working or you feel any other problem with it, please Leave a Comment / Feedback. If शिव चालीसा | Shiv Chalisa is a copyright material Report This. We will not be providing its PDF or any source for downloading at any cost.

RELATED PDF FILES

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *