समाजशास्त्र के सिद्धांत PDF

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समाजशास्त्र के सिद्धांत PDF Summary

नमस्कार पाठकों, इस लेख के माध्यम से आप समाजशास्त्र के सिद्धांत PDF के रूप में प्राप्त कर सकते हैं। समाजशास्त्र के सिद्धांत सभी के लिए सार्वभौमिक होते हैं तथा यह सिद्धांत समाज में एक संन्यवयता तथा समरसता स्थापित करने का भी कार्य करते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा वह समाज में ही रहना पसंद करता है ।
समाजशास्त्र के सिद्धांत न केवल विद्यार्थियों के लिए अवश्यक है अपितु एक आम नागरिक के लिए भी जीवन में बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं क्योंकि इस समाज में रहते हुये व्यक्ति को अपने सामाजिक मूल्यों, कर्तव्यों तथा सिद्धांतों के प्रति जागरूक व सजग होना ही चाहिए ताकि समय आने पर वह सामाजिक उत्थान में साहयता कर सके।

समाजशास्त्र के सिद्धांत PDF

  • सार्वभौमिकता 

समाजशास्त्री सिद्धांत सार्वभौमिक होते है। ये समान परिस्थिति मे समान तरह की घटनाओं पर लागू होते है।

  • परीक्षणात्मक

समाजशास्त्री सिद्धांत काल्पनिक नही होते। ये अवलोकन से प्राप्त तथ्यों पर आधारित होते है।

  • प्रत्यक्षात्मक

समाजशास्त्री सिद्धांत यथार्थवादी होते है।

  • तर्क संगत 

समाजशास्त्रीय सिद्धांत तर्क की कसौटी पर परखे जाते है।

  • मूल्य मुक्त

समाजशास्त्रीय सिद्धांत मूल्यों से मुक्त होते है। इसमे क्या उचित है तथा क्या अनुचित है, इसका वर्णन नही किया जाता है।

  • वैज्ञानिक आधार

समाजशास्त्रीय सिद्धांतों का आधार वैज्ञानिक होता है। इनका निर्माण वैज्ञानिक पद्धति द्वारा होता है।
उपरोक्त विशेषताओं के संदर्भ मे कुछ समाजशास्त्रीयों ने इन्हे अपने अनुसार आलोचनात्मक दृष्टिकोण से स्पष्ट किया है। कोहन ने लिखा है कि ऐसे बहुत से कारण है जिनकी वजह से समाजशास्त्री सिद्धांत विज्ञान की कसौटी पर खरा नही उतरता।

समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों का महत्त्व

समाजशास्त्र में समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अब्राहम ने हमारा ध्यान समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के निम्नलिखित आठ प्रकार्यों की ओर दिलवाने का प्रयास किया है-

  • समाजशास्त्रीय सिद्धान्त सम्भावित समस्याओं एवं अर्थपूर्ण उपकल्पनाओं की ओर संकेत करते हैं जो नवीन अन्वेषणों अथवा अध्ययनों का आधार बनती हैं।
  • समाजशास्त्रीय सिद्धान्त तथ्यों के बारे में पूर्वानुमान लगाने में सहायता देते हैं । एक अर्थपूर्ण सिद्धान्त अन्तर्दर्शी ज्ञान, ऐतिहासिक विश्लेषण तथा सामाजिक समरूपताओं के अवलोकन पर आधारित होने के कारण पूर्वानुमान हेतु एक ठोस आधारशिला प्रस्तुत करता है।
  • समाजशास्त्रीय सिद्धान्त विषय वस्तु एवं तथ्यों के सम्बन्धों को क्रमबद्ध बनाते हैं तथा सरल अवधारणात्मक योजना प्रदान करते हैं।
  • समाजशास्त्रीय सिद्धान्त विशिष्ट आनुभविक निष्कर्षो तथा समाजशास्त्रीय उन्मुखीकरणों अथवा दिग्गवन्यासों (Sociological orientations) के बीच कड़ी प्रदान करते हैं तथा इससे शोध की सार्थकता बढ़ जाती है
  • अर्थ प्रदान करके समाजशास्त्रीय सिद्धान्त सत्यता को अनुप्रमाणित भी करते हैं।
  • समाजशास्त्रीय सिद्धान्त शोध को निर्देशित करते हैं तथा अध्ययन किए जाने वाले तथ्यों की श्रेणी को परिसीमित भी करते हैं।
  • समाजशास्त्रीय सिद्धान्त अन्वेषण के उपकरण भी हैं। वे शोध प्ररचना के निर्माण में सहायता प्रदान करते हैं।
  • समाजशास्त्रीय सिद्धान्त हमारे ज्ञान में त्रुटियाँ बताते हैं तथा इन्हें पूरा करने में सहायता प्रदान करते हैं।

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