रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएं PDF

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रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएं PDF Summary

नमस्कार पाठकों , इस लेख के माध्यम से आप रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएं PDF प्राप्त कर सकते हैं। जो भी विद्यार्थी रीतिकाल के सन्दर्भ में विस्तार से जानना चाहते हैं ताकि वह न केवल परीक्षा में सफल हो सकें बल्कि हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण चरणों के सन्दर्भ में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकें।

आचार्यत्व प्रदर्शन की प्रवृत्ति इस काल की मुख्य विशेषता कही जा सकती है। इस काल के प्रायः सभी कवि आचार्य पहले थे और कवि बाद में । उनकी कविता पांडित्य के भार में दबी हुई है। श्रृंगारप्रियता इस काल की दूसरी मुख्य प्रवृत्ति है। सभी कवियों ने श्रृंगार में अतिशय रुचि दिखायी है। अतः इस काल में श्रृंगारप्रियता का महत्व था।

रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएं PDF

(1) आचार्यत्व प्रदर्शन की प्रवृत्ति- यह इस काल की मुख्य विशेषता कही जा सकती है। इस काल के प्रायः सभी कवि आचार्य पहले थे और कवि बाद में । उनकी कविता पांडित्य के भार में दबी हुई है।

(2) श्रृंगारप्रियता-यह इस काल की दूसरी मुख्य प्रवृत्ति है। सभी कवियों ने श्रृंगार में अतिशय रुचि दिखायी है। यह शृंगार वर्णन अश्लील कोटि तक पहुँच गया है।
काम झूलै उर में, उरोजनि में दाम झूले । श्याम झूलै प्यारी की अनियारी अँखियन में ||

(3) अलंकारप्रियता-अलंकारिता या चमत्कार प्रदर्शन इस काल की तीसरी मुख्य प्रवृत्ति है। अनुप्रास की छटा, यमक की झलक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, रूपक, उपमा आदि नाना अलंकारों के चमत्कार से रीतिकाल की कविता चमत्कृत है- “गग-गग गाजे गगन घन क्वार के।”

रीतिकाल के तीन कवियों के नाम एवं रचनाएँ

  • मतिराम-फूलमंजरी, लक्ष्मण, शृंगार,
  • घनानंद-सुजानमति, वियोगबेलि,
  • बिहारी-बिहारी सतसई।

भक्ति और श्रृंगार की विभाजक रेखा सूक्ष्म है। भक्ति की अनुभूति को व्यक्त करने के लिए बहुत बार राधा-कृष्ण के चरित्र एवं दाम्पत्य जीवन के विविध प्रतीकों का सहारा लिया गया। कबीर जैसे बीहड़ कवि भी भाव-विभोर हो कह उठते हैं: “हरि मोरा पिउ मैं हरि की बहुरिया”। मर्यादावादी तुलसी भी निकटता को व्यक्त करने के लिए “कामिनि नारि पिआरि जिमि” जैसी उपमा देते हैं। कालांतर में राधा-कृष्ण के चरित्र अपने रूप से हट गए और वे महज दांपत्य जीवन के प्रतीक बन कर रह गए।

प्रेम और भक्ति की संपृक्त अनुभूति में से भक्ति क्रमश: क्षीण पड़ती गई और प्रेम श्रृंगारिक रूप में केन्द्र में आ गया। भक्ति काल का रीतिकाल में रूपांतरण की यही प्रक्रिया है। रीतिकालीन काव्य की मूल प्रेरणा ऐहिक है। भक्तिकाल की ईश्वर-केन्द्रित दृष्टि के सामने इस मानव केन्द्रित दृष्टि की मौलिकता एवं साहसिकता समझ में आती है। आदिकालीन कवि अपने नायक को ईश्वर के जैसा महिमावान अंकित किया था। भक्त कवियों ने ईश्वर की नर लीला का चित्रण किया तो रीतिकालीन कवियों ने ईश्वर एवं मनुष्य दोनों का मनुष्य रूप में चित्रण किया। भक्त कवि तुलसीदास लिखते हैं:

कवि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ

मति अनुरूप राम गुन गाउँ।

परन्तु भिखारीदास का कहना है:

आगे की कवि रीझिहैं तौ कविताई,

न तौ राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो हैं।

एक के लिए भक्ति प्रधान है, इस प्रक्रिया में कविता भी बन जाए तो अच्छा है. कवि तो राम का गुण-गान करता है। वहीं दूसरे के लिए कविता की रचना महत्त्वपूर्ण है। यदि कविता न बन सके तो उसे राधा-कृष्ण का स्मरण मान लिया जाए। सम्पूर्ण रीति साहित्य को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है। रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त. वास्तव में रीतिबद्ध कवि रीतिसिद्ध भी थे और रीतिसिद्ध कवि रीतिबद्ध भी। इस युग के राजाश्रित कवियों में से अधिकांश तथा जनकवियों में से कतिपय ऐसे थे जिन्होंने आत्मप्रदर्शन की भावना या काव्य-रसिक समुदाय को काव्यांगों का सामान्य ज्ञान कराने के लिए रीतिग्रंथों का प्रणयन किया।

अत: इनकी सबसे प्रमुख विशेषता व प्रवृत्ति रीति-निरूपण की ही थी। इसके साथ ही आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए श्रृंगारिक रचनाएँ भी की। अत: श्रृंगारिकता भी इस युग की प्रमुख प्रवृत्ति थी. इधर आश्रयदाता राजाओं के दान, पराक्रम आदि को आलंकारिक करने से उन्हें धन-सम्मान मिलता था। वहीं धार्मिक संस्कारों के कारण भक्तिपरक रचनाएँ करने से आत्म लाभ होता था। इस प्रकार राज-प्रशस्ति एवं भक्ति भी इनकी इनकी प्रवृत्तियों के रूप में परिगणित होती है। दूसरी ओर इन कवियों ने अपने कटु-मधुर व्यक्तिगत अनुभवों को भी समय-समय पर नीतिपरक अभिव्यक्ति प्रदान किया। अत: नीति इनकी कविता का अंग कही जा सकती है।

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