पशुपति स्तोत्र | Pashupati Stotra PDF in Hindi

पशुपति स्तोत्र | Pashupati Stotra Hindi PDF Download

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पशुपति स्तोत्र | Pashupati Stotra Hindi PDF Summary

Dear readers, here we are providing Pashupati Stotra PDF to you. Pashupati Stotra is a very beneficial Vedic hymn dedicated to Lord Shiva who is one of the most worshipped deities in Hindu Dharma. There are many devotees of Lord Shiva who want to please him and seek his blessings.

Lord Shiva is one of the most powerful deities in Hinduism. He is also a member of three major deities those known as Trimurti. The Trimurti includes Lord Brahma, Lord Vishnu, and Lord Mahesha. Lord Mahesha is one of the beautiful and holy names of Lord Shiva.

Pashupati Stotra PDF

स पातु वो यस्य जटाकलापे

स्थितः शशाङ्कः स्फुटहारगौरः  ।

नीलोत्पलानामिव नालपुञ्जे

निद्रायमाणः शरदीव हंसः ॥ १॥

जिनके जटाजूटमें स्थित गौरवर्णका चन्द्रमा शरद्-ऋतुमें

नील कमलके नालोंमें निद्रायमाण हंस-सा दीख रहा है, ऐसे

चन्द्रभूषण भगवान पशुपति आप सबकी रक्षा करें ॥ १॥

 

जगत्सिसृक्षाप्रलयक्रियाविधौ

प्रयलमुन्मेषनिमेषविभ्नमम्  ।

वदन्ति यस्येक्षणलोलपक्ष्मणां

पराय तस्मै परमेष्ठिने नमः ॥ २॥

जिन भगवान पशुपतिके चंचल नेत्रोंको पलकोंका उन्मेष

(खोलना) , निमेष (बंद करना) एवं विभ्रम (घूमना) संसारकी

सृष्टि, पालन तथा संहारकी क्रियाओंका प्रयत्न कहा जाता है,

उन परात्पर परमेष्ठी भगवान पशुपतिको नमस्कार है ॥ २॥

 

व्योम्नीव नीरदभरः सरसीव वीचि-

व्यूहः सहस्रमहसीव सुधांशुधाम ।

यस्मिन्निदं जगदुदेति च लीयते च

तच्छाम्भवं भवतु वैभवमृद्धये वः ॥ ३॥

जिनके भीतर यह जगत् उसी प्रकार प्रकट और विलीन

होता रहता है, जिस प्रकार आकाशमें मेघपुंज, तालाबमें तरंगसमूह

और अनन्त दीप्तिवाले सूर्यमण्डलमें चन्द्रमाकी किरणें, ऐसे

भगवान पशुपति शंकर आप सबको सुख-समृद्धि प्रदान करें ॥ ३॥

यः कन्दुकैरिव पुरन्दरपद्मसदा-

पद्यापतिप्रभृतिभिः प्रभुरप्रमेयः  ।

खेलत्यलङ्घ्यमहिमा स हिमाद्रिकन्या-

कान्तः कृतान्तदलनो गलयत्वघं वः ॥ ४॥

अप्रमेय एवं अनतिक्रमणीय महिमावाले तथा कृतान्त (यमराज) –

का दलन करनेवाले, इन्द्र, ब्रह्मा और विष्णु आदिके साथ

क्रोड़ा-कन्दुक बनकर संसारमें क्रीड़ा करनेवाले पार्वतीपति

भगवान पशुपति आपलोगोंके पापको नष्ट करें ॥ ४॥

 

दिश्यात् स शीतकिरणाभरणः शिवं वो

यस्योत्तमाङ्गभुवि विस्फुरदुर्मिपक्षा ।

हंसीव निर्मलशशाङ्ककलामृणाल-

कन्दार्थनी सुरसरिन्नभतः पपात ॥ ५॥

जिन भगवान शंकरके सिरपर अपनी लहरोंके साथ लहराती

हुई गंगा आकाशसे इस प्रकार अवतरित हो रही हैं, जैसे

चन्द्रमाको निर्मल मृणालकन्द समझकर उसे पानेकी इच्छा करती

हुई और अपने पंखोंको हिलाती-डुलाती हंसी आकाशसे

सरोवरमें उतर रही हो । ऐसे शीतकिरण चन्द्रमाको आभूषणरूपमें

धारण करनेवाले भगवान पशुपति आप सबका कल्याण करें ॥ ५॥

 

॥ इति पशुपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ इस प्रकार पशुपतिस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

वन्दे शिवं शङ्करम्

श्री पशुपति नाथ आरती | Shri Pashupati Nath Ji Aarti

ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा ।

त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा ॥

ॐ जय गंगाधर …

कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने ।

गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने ॥

ॐ जय गंगाधर …

कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता ।

रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥

ॐ जय गंगाधर …

तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता ।

तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता ॥

ॐ जय गंगाधर …

क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्‌ ।

इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्‌ ॥

ॐ जय गंगाधर …

बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता ।

किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता ॥

ॐ जय गंगाधर …

धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते ।

क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते॥

ॐ जय गंगाधर …

रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता ।

चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां ॥

ॐ जय गंगाधर …

तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते ।

अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥

ॐ जय गंगाधर …

कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्‌ ।

त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्‌ ॥

ॐ जय गंगाधर …

सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्‌ ।

डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्‌ ॥

ॐ जय गंगाधर …

मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्‌ ।

वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्‌ ॥

ॐ जय गंगाधर …

सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्‌ ।

इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥

ॐ जय गंगाधर …

शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते ।

नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते ॥

ॐ जय गंगाधर …

अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा ।

अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा ॥

ॐ जय गंगाधर …

ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा ।

रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा ॥

ॐ जय गंगाधर …

संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते ।

शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥

ॐ जय गंगाधर …

॥ इति श्री पशुपति नाथ आरती संपूर्णम् ॥

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