पार्वण श्राद्ध पद्धति | Parvan Shraddh Vidhi PDF in Hindi

पार्वण श्राद्ध पद्धति | Parvan Shraddh Vidhi Hindi PDF Download

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पार्वण श्राद्ध पद्धति | Parvan Shraddh Vidhi Hindi PDF Summary

प्रिय पाठकों, प्रस्तुत लेख में हम आपको पार्वण श्राद्ध पद्धति PDF / Parvan Shraddh Vidhi PDF Hindi भाषा में प्राप्त कर सकते हैं। ‘मत्स्य पुराण’ में तीन प्रकार के श्राद्ध बताए गए हैं- नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य। ‘यम स्मृति’ में पांच प्रकार के श्राद्ध का उल्लेख है- नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि व पार्वण श्राद्ध। पूर्णिमा इन सभी के मिलन का श्रेष्ठ दिन है। कहते हैं कि जिन पितरों का पार्वण श्राद्ध नहीं होता, उनकी तृप्ति भी नहीं हो पाती है।

इसलिए पूर्णिमा व अमावस्या के श्राद्ध को शास्त्रों में विशेष स्थान दिया गया है। इस कालखंड में जो संतति अपने पितरों अर्थात श्रेष्ठजनों के प्रति श्रद्धा का भाव नहीं दिखाती, उसे पितरों की कृपा से वंचित रहना पड़ता है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा का यह भाव जीवित पितरों के प्रति भी वैसा ही होना चाहिए, जैसा कि दिवंगत पितरों के प्रति दिखाई देता है।

पार्वण श्राद्ध पद्धति | Parvan Shraddh Vidhi

पार्वण श्राद्ध क्या है ?

पितृपक्ष, अमावस्या एवं तिथि आदि पर किए जाने वाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहते हैं। पर्वे भवति पार्वणः जो त्रैपूरूषात्मक श्राद्ध पर्व पर हो वह पार्वण श्राद्ध होता है। आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ = पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं।

श्राद्ध व पिंडदान कहाँ करना चाहिए ?

देश में श्राद्ध के लिए हरिद्वार, गंगासागर, जगन्नाथपुरी, कुरूक्षेत्र, चित्रकूट, पुष्कर, बद्रीनाथ, बोधगया सहित आदि 55 स्थानों को माना गया है, किन्तु शास्त्रों में पिंडदान के लिए तीन जगहों को सबसे विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है।

  • बद्रीनाथ के पास ब्रह्मकपाल सिद्ध क्षेत्र में पितृदोष मुक्ति के लिए तर्पण का विधान है।
  • हरिद्वार में नारायणी शिला के पास लोग पूर्वजों का पिंडदान करते हैं।
  • बिहार की राजधानी पटना से 100 किलोमीटर दूर गया में साल में एक बार 17 दिन के लिए मेला लगता है। इसे पितृ-पक्ष मेला कहा जाता है।

श्राद्ध व पिंडदान का वर्णन कहाँ मिलता है ?

श्राद्ध व पिंडदान का वर्णन निम्नलिखित पुराणों में प्राप्त होता है –

कर्मांक

पुराण

1. वायु पुराण
2. अग्नि पुराण
3. गरुण पुराण

पिंडदान की परंपरा सृष्टी के रचनाकाल से ही शुरू है। जिसका वर्णन वायु पुराण, अग्नि पुराण और गरुण पुराण में वर्णित है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने अपने पूर्वजों का नदी के तट पर पिंडदान किया था और त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ के मरने के बाद गया में ही पिंडदान किया था। यहां सीताकुंड नाम से एक मंदिर भी है।

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