परशुराम चालीसा | Parshuram Chalisa PDF

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परशुराम चालीसा | Parshuram Chalisa PDF Summary

नमस्कार पाठकों, इस लेख के माध्यम से आप परशुराम चालीसा / Parshuram Chalisa PDF प्राप्त कर सकते हैं। परशुराम जी को भगवान श्री हरी विष्णु जी के अवतार के रूप में जाना जाता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार परशुराम जी ने अनेकों बार इस धारा को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। वह विष्णु जी के उग्र अवतारों में से एक हैं।

परशुराम जी ने अनंत वर्षों तक भगवान शिव जी की कठोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने उन्हें अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए थे। वह अपने मुख्य शस्त्र के रूप में एक फरसा धारण करते हैं जिसे परशु भी कहा जाता है इसी कारण उन्हें परशुराम के रूप में पूजा जाता है।

श्री परशुराम चालीसा / Shri Parshuram Chalisa PDF

दोहा

श्रीशिव गुरु स्वामी माहेश्वर मज तु उद्धारी ।

उमा सहीत दायकु आर्शिवाद मज तु तारी ॥

बुद्धिदेवता तव जानिके दिये परशु तुमार ।

तव बल जानिये दुनिया सारी दुष्टि करे हहाकार ॥

चौपाई

जय परशुराम बलवान दुनिया सार।

जय रामभद्र कहे लोक करे जागर॥१॥

शिव शिष्य भार्गव तव नामा ।

रेणुका पुत्र जमतग्निसुत लामा ॥२॥

शुरविर नारायण तव अंगी ।

छटा अवतार सुहीत के संगी ॥३॥

परशु तव हस्ता दिसे सुवेसा ।

ऋषि मुद्रिका तव मन श्रेसा ॥४॥

हाथ शिवधनुष्य भार्गवा साजै ।

विप्र कुल कांधे जनेउ साजै ॥५॥

विष्णु अंश ब्रह्मकुलनंदन ।

तव गाथा पढे करे जग वंदन ॥६॥

वेद ही जानत असे चतुर ।

शिवजी के शिष्य बलशाली भगुर ॥७॥

पृथ्वि करे निक्षेत्र एक्कीस समया ।

विप्र रक्षोनी दुष्टास मारीया ॥८॥

भार्गव अवतारी तव गुन गावा ।

कर्म स्वरुपे तव चिरंजीवी पावा ॥९॥

सहस्राजुना तव तु संहारे ।

पिता वचन दिये तव तु पारे ॥१०॥

पीता होत तव अज्ञाये ।

माता शिरछेद कर तु जाये ॥११॥

जमदग्नी कहे मम पुत्र प्रियई ।

तुम जो चांहे आर्शिवाद मांगई ॥१२॥

भद्र कहते मम माता ही जगावैं ।

भ्राता सहीत मम सामोरी लावैं ॥१३॥

तव मुखमंडल दिसे ऋषिसा ।

घोर तपस्वि पठन संहीता ॥१४॥

मुद्रा गिने कुबेर ही थक जांते ।

तव धन कबि गिन ना पांते ॥१५॥

तुम उपकार ब्रह्मकुले कीह्ना ।

ब्रह्म मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो शक्ती सब जग जाना ।

राक्षस कांपे तुमये भय माना ॥१७॥

तुम चिरंजीव असे जग जानु ।

जो करे तव भक्ती मधुर फल भानु ॥१८॥

बुद्धिदाता परशु हथ तुज देई ।

शिव धनुष्य माहेश्वर मिलमेेई ॥१९॥

दुष्ट संहार कर त्रिलोक जिते ।

ब्रह्मकुल के तुम भाग्यविधाते ॥२०॥

ऋषि मुनि के तुम रखवारे ।

शिव आज्ञा होत दुहीत को संहवारे ॥२१॥

सब जग आंये तुह्मरी शरना ।

तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

परशु चमक रवि ही छुंपै ।

भार्गव नाम सुनत दुष्ट थर कांपै ॥२३॥

रेणुका पुत्र नाम जब आंवै ।

तब तव गान सहस्र जुग गांवै ॥२४॥

परशुराम नाम सुरा ।

जपत रहो ब्रह्मविरा ॥२५॥

संकट पडे तो भद्र बचांवै ।

मन से ध्यान भार्गव जो लांवै ॥२६॥

जगत के तुम तपस्वी राजा ।

ब्रह्मकुल जन्मे उपकार मज वर कीजा ॥२७॥

इच्छा धरीत तुज भक्ती जो कीवै ।

इच्छित जो तिज फल पावै ॥२८॥

भार्गव नाम सुनित होय उजियारा ।

आज्ञा पालत तव जग दिवाकरा ॥२९॥

राम सह धनुर युद्ध पुकारे ।

अवतार सप्तम समज दुवारे ॥३०॥

युद्ध कौशल्य वेदो जानता ।

कौतुक देखे रेणुका माता ॥३१॥

चारो जुग तुज कीर्तीमासा ।

सदा रहो ब्रह्मकुल के रासा ॥३२॥

तेहतीस कोट देव तुज गुन गावै ।

भार्गव नाम लेत सब दुख बिसरावै ॥३३॥

तुज नाम महीमा लागे माई ।

जनम जनम करे पुण्य कमाई ॥३४॥

म्हारे चित्त तुज दुज ना जाई ।

सारे सेई सब सुख मज पाई ॥३५॥

परशुराम नाम सुने भागे पीरा ।

भद्र नाम सुनत उठे ब्रह्मविरा ॥३६॥

जय परशुराम कहें मज विप्राईं ।

तुज कृपा करहु भार्गव नाईं ॥३७॥

पठे जो यह शत बार कोई ।

भार्गव कृपा उस सदैव होई ॥३८॥

पढित यह परशुराम चालीसा ।

सुख शांती नांदे रहे विष्णुदासा ॥३९॥

वसंतसुत पुरुषोत्तम रज असै तैरा।

तुज भक्ती मोही जुग जग सारा ॥४०॥

दोहा

रेणुका नंदन नारायण अंश ब्रह्मकुल रुप ।

परशुराम भार्गव रामभद्र ह्रदयी बसये भुप ॥

श्री परशुराम जी की आरती / Shri Parshuram Aarti Lyrics PDF

ओउम जय परशुधारी, स्वामी जय परशुधारी।

सुर नर मुनिजन सेवत, श्रीपति अवतारी।। ओउम जय।।

जमदग्नी सुत नरसिंह, मां रेणुका जाया।

मार्तण्ड भृगु वंशज, त्रिभुवन यश छाया।। ओउम जय।।

कांधे सूत्र जनेऊ, गल रुद्राक्ष माला।

चरण खड़ाऊँ शोभे, तिलक त्रिपुण्ड भाला।। ओउम जय।।

ताम्र श्याम घन केशा, शीश जटा बांधी।

सुजन हेतु ऋतु मधुमय, दुष्ट दलन आंधी।। ओउम जय।।

मुख रवि तेज विराजत, रक्त वर्ण नैना।

दीन-हीन गो विप्रन, रक्षक दिन रैना।। ओउम जय।।

कर शोभित बर परशु, निगमागम ज्ञाता।

कंध चार-शर वैष्णव, ब्राह्मण कुल त्राता।। ओउम जय।।

माता पिता तुम स्वामी, मीत सखा मेरे।

मेरी बिरत संभारो, द्वार पड़ा मैं तेरे।। ओउम जय।।

अजर-अमर श्री परशुराम की, आरती जो गावे।

पूर्णेन्दु शिव साखि, सुख सम्पति पावे।। ओउम जय।।

श्री परशुराम जी की दूसरी आरती / Shri Parshuram Second Aarti Lyrics PDF

शौर्य तेज बल-बुद्घि धाम की॥

रेणुकासुत जमदग्नि के नंदन।

कौशलेश पूजित भृगु चंदन॥

अज अनंत प्रभु पूर्णकाम की।

आरती कीजे श्री परशुराम की ॥1॥

नारायण अवतार सुहावन।

प्रगट भए महि भार उतारन॥

क्रोध कुंज भव भय विराम की।

आरती कीजे श्री परशुराम की ॥2॥

परशु चाप शर कर में राजे।

ब्रम्हसूत्र गल माल विराजे॥

मंगलमय शुभ छबि ललाम की।

आरती कीजे श्री परशुराम की ॥3॥

जननी प्रिय पितु आज्ञाकारी।

दुष्ट दलन संतन हितकारी॥

ज्ञान पुंज जग कृत प्रणाम की।

आरती कीजे श्री परशुराम की ॥4॥

परशुराम वल्लभ यश गावे।

श्रद्घायुत प्रभु पद शिर नावे॥

छहहिं चरण रति अष्ट याम की।

आरती कीजे श्री परशुराम की ॥5॥

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