पापांकुशा एकादशी व्रत कथा | Papankusha Ekadashi Vrat Katha PDF in Hindi

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पापांकुशा एकादशी व्रत कथा | Papankusha Ekadashi Vrat Katha Hindi PDF Summary

दोस्तों आज हम आपके लिए लेकर आये हैं पापांकुशा एकादशी व्रत कथा PDF / Papankusha Ekadashi Vrat Katha PDF in Hindi पापांकुशा एकादशी व्रत कथा का महत्व बहुत ही अधिक है। जैसा की इस एकादशी का नाम है, पापकुंशा अथार्त पापों को नष्ट करने वाली एकादशी। इस एकादशी व्रत के प्रभाव से जातक के जीवन में होने वाले समस्त प्रकार के जाने – अनजाने पापों का नाश होता है। जिस व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार के दोष के करना समस्या का सामना करना पड़ रहा है, उस व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।

एकादशी व्रत करने से न केवल भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है बल्कि देवी लक्ष्मी का घर में आगमन होता है। यदि आप भी अपने घर में देवी लक्ष्मी का आगमन चाहते हैं तथा यह चाहते हैं की आपके घर में धन – धान्य की कोई कमी न हो, तो इस व्रत को विधि – विधान से अवश्य करें।

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा PDF | Papankusha Ekadashi Vrat Katha PDF in Hindi

एक समय विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहुत ही क्रूर, कपटी और छल-कपट में हमेशा लिप्त रहने वाला बहेलिया रहा करता था। जब उसका अंत समय आया तो यमराज ने अपने दूतों को उस दुष्ट बहेलिया के प्राण हरने के लिए भेजा. इसके बाद जब यमराज के दूतों ने बहेलिया के पास जाकर कहा कि कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन रहेगा। ऐसा सुनते ही बहेलिया घबरा गया और अपने प्राण को बचाने के लिए महर्षि अंगिरा के पास मदद मांगने पहुंचा। तब महर्षि ने उस बहेलिये को पापों से मुक्ति दिलाने वाले पापाकुंशा एकादशी का व्रत करने को कहा। बहेलिया द्वारा इस व्रत को रखने के कारण पूर्व में किए गये पाप नष्ट हो गए और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।

पापांकुशा एकादशी व्रत विधि PDF | Papankusha Ekadashi Vrat Vidhi PDF

पापांकुशा एकादशी व्रत को श्रद्धा एवं भक्ति भाव से करने वाले व्यक्ति पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं और उसे सुख, संपत्ति, सौभाग्य और मोक्ष प्रदान करते हैं। पापांकुशा एकादशी व्रत वाले दिन साधक को प्रात:काल स्नान-ध्यान करने के पश्चात् सबसे पहले श्री हरि विष्णु का ध्यान करके व्रत को पूरा करने का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद ईशान कोण में भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को पीले कपड़े पर रखें और उनका स्नान कराएं। ध्यान रहे कि भगवान विष्णु की पूजा में चावल का प्रयोग न करें। चावल की बजाय गेहूं की ढेरी पर भगवान का कलश रखकर उसमें गंगा जल भरें और उस पर पान के पत्ते और श्रीफल यानि नारियल रखें। कलश में रोली से ओम और स्वास्तिक बनाएं। इसके भगवान विष्णु को विशेष रूप से पीले पुष्प और पीले फल आदि चढ़ाएं। यदि संभव हो तो अजा एकादशी की रात्रि को जागरण करते हुए भगवान का कीर्तन करना चाहिए। व्रत के दूसरे दिन किसी ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद ही स्वयं भोजन करें. व्रत वाले दिन साधक को अपने सामथ्र्य के अनुसार पूजा.पाठ, भजन तथा ब्राह्मणों को दान व दक्षिणा देना चाहिए।

एकादशी व्रत की आरती PDF | Ekadashi Vrat Aarti PDF

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।

 

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।

 

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।

 

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,

शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

 

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

 

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,

पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

 

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,

नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

 

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,

नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।

 

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।

देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

 

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।

 

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।

इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।

 

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।

रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।

 

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।

पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।

 

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।

शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।

 

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।

जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।

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