मनुस्मृति | Manusmriti PDF in Sanskrit

मनुस्मृति | Manusmriti Sanskrit PDF Download

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मनुस्मृति | Manusmriti Sanskrit PDF Summary

Dear readers, today we are going to share मनुस्मृति PDF / Manusmriti PDF in Sanskrit Download for all of you. As you all know that Manusmriti is considered a very famous and significant and knowledgeable Hindi scripture. There is a total of 12 chapters in Manusmriti which have 2684 meaningful verses.

Through these shlokas, man learns to lead a good life. Manusmriti is an ancient Dharmashastra of Hind Dharma. Dharmashastra itself is also called Smriti. This ancient scripture is believed to have been one of the first Sanskrit texts to be translated into English in 1776.

Through some sources, it is believed that the number of shlokas is not 2684 but 2964. So friends, if you are interested to know more important information about this scripture, then you can download the manusmriti Sanskrit Hindi pdf below in this post.

मनुस्मृति PDF | Manusmriti PDF Sanskrit and Hindi – मनुस्मृति प्रथम अध्याय का सरल अर्थ

मनुस्मृति अध्याय 1 – श्लोक 1

मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन।।1।।

हिन्दी अर्थ- मनु महाराज एकांत जगह में बैठे हुए हैं। वहां पर बहुत सारे ऋषि-मुनि जाते हैं और भगवान मनु की पूजा-अर्चना करते हैं। इसप्रकार पूजा के फलस्वरूप मनु महाराज से प्रश्न करते हैं कि-

भगवन्! सर्ववर्णानां यथावदनुपूर्वशः।
अन्तरप्रभवाणां च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि।। श्लोक 2।।

हिन्दी अर्थ- हे भगवान! सभी वर्णों (जाति) का धर्म यथावत् हमको बताइये। एवं इन वर्णों के अंदर जितने भी धर्म-सम्प्रदाय हैं, उन सभी के धर्मों के बारे में हमें बताने की कृपा करें।

त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयम्भुवः।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्वार्थवित्प्रभो।। श्लोक 3।।

हिंदी अर्थ- हे भगवन! तुम ही इस संसार के सब विधानों के स्वयम्भू हो। अर्थात् तुमने ही इस संसार में सबसे पहले ये नियम कानून बनाए हैं‌। तुम ही एक अचिन्त्य हो।जो अप्रमेय ब्रह्म है, उसके वास्तविक तत्व को जाननेवाले तथा मोक्ष को जाननेवाले केवल एकमात्र आप ही हो।

स तै पृष्टस्तथा सम्यगमितौजा महात्मभिः।
प्रत्युवाचार्च्य तान्सर्वान्महर्षिञ्छ्रूयतामिति। । श्लोक 4।।

हिंदी अर्थ- ऋषि-मुनियों के पूछने पर भगवान मनु भी उन ऋषि-मुनियों के प्रत्युवचन करने से पहले उनकी अर्चना और सत्कार करते हुए प्रत्युवचन देते हैं और कहते हैं सुनो!

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः।। श्लोक 5।।

हिंदी अर्थ- भगवान मनु ऋषि -मुनियों से कहते हैं-  यह सम्पूर्ण संसार अंधकारमय था। कहीं भी कुछ नहीं था। न कोई इसको जान सकता था और न ही इसका कोई लक्षण था। इसके बारें में कोई तर्क-वितर्क भी  नहीं कर सकता था। यह जानने योग्य नहीं था। यह प्रसुप्त (सोये हुए) संसार की आदिम अवस्था ही सबसे पहली अवस्था थी। उस समय अंधकार ही अंधकार था। बिल्कुल सोये हुए व्यक्ति के जैंसे यह ब्रह्माण्ड भी अन्धकार में सोया हुआ था।

तदण्डमभवद्धैमं सहस्त्रांशुसमप्रभम्।
तस्मिन्जज्ञे स्वयं ब्रहमा सर्वलोकपितामहः। श्लोक 6।।

हिंदी अर्थ- इस सृष्टि को बनाने से पहले भगवान ने जो स्वयंभू था। अर्थात् स्वयं उत्पन्न हुआ। उसने सबसे पहले अपने आप को बनाया । तत्पश्चात उन्होंने इस सृष्टि की रचना करने का संकल्प लिया और उन्होंने 5 तत्वों को निर्माण किया। “क्षिति जल पावक गगन समीरा। अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश इन पंच महाभूतों की उत्पत्ति की।

योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः।
सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्वभौ ।। श्लोक 7।।

हिंदी अर्थ- जो ईश्वर था, जिसने इस सृष्टि की रचना की, जिसने इन पंच भूतों को व्यक्त किया, जिसने इस जगत की उत्पत्ति की, जो स्वयंभू था, जो परमात्मा था जिसकी उत्पत्ति का कोई कारण नहीं था। ऐंसा ईश्वर जिसको इंद्रियों के द्वारा जाना नहीं  जा सकता है। जिसके बारे में कोई कुछ बता भी नहीं सकता है। वह सनातन है। अनादि व अनन्त है और सभी प्राणियों में वही ईश्वर है। ऐंसे उस अनादि अनन्तरूप परमेश्वर ने सबसे पहले अपने आप को ही बनाया।

सोऽभिध्यायशरीरात्स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ।। श्लोक 8।।

हिंदी अर्थ- जो वह परमात्मा था। उसने सर्वप्रथम सृष्टि की रचना करने के लिए अपने मन ही मन में ध्यान करके अपने ही शरीर से सबसे पहले जल की उत्पत्ति की और फिर उस जल में एक बीज बोया।

तदण्डमभवद्धैमं सहस्त्रांशुसमप्रभम्।
तस्मिन्जज्ञे स्वयं ब्रहमा सर्वलोकपितामहः ।।9।।

हिंदी अर्थ- जो बीज उस परमात्मा ने जल में बोया था। उस बीज फिर से अंडा उत्पन्न हुआ, जो सोने का अण्डा था। वह स्वर्णमय अण्डा करोड़ों सूर्य की रोशनी के समान चमक रहा था। फिर उस अंडे से सभी लोगों के परम पिता ब्रह्मा जी ने अपने आप को प्रगट किया।

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
ता यदस्यायनं पूर्वं येन नारायणः स्मृतः ।। श्लोक10।।

हिंदी अर्थ- जो जल है। वह भगवान नर (विष्णु) के  पुत्र समान है। अरः जल को नार कहा जाता है क्योंकि जल नर अर्थात् विष्णु से उत्पन्न होता है। (नरस्य अपत्यम् इति नारम् अण् प्रत्यय) ।‌ नर भगवान विष्णु को ही कहा जाता है और उनसे ही जल की उत्पत्ति हुई। इसलिए जल को नार भी कहा जाता है। नार का आयन अर्थात् आश्रय होने के कारण ही भगवान विष्णु को नारायण भी कहा जाता है।

यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
तद्विसृष्टः सः पुरुषो लोके ब्रह्मेति कल्प्यते ।। श्लोक 11।।

हिंदी अर्थ- सबसे पहले जो कारण था। जिसे कोई जान नहीं सकता था। वह नित्य था। सनातन था। सद् और असद् दोनों‌ से युक्त था। नित्य संसार व अनित्य संसार दोनों उसी में समाए थे। उसको जो रचने वाला था, जो सृष्टि को रचने वाला था, जो कारण को जो रचने वाला था जो सबसे पहले था वही इस संसार में ब्रह्म के रूप में जाना जाता है।

तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।
स्वयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद्द्विधा ।। श्लोक 12।।

हिंदी अर्थ- उस अंडे में वही भगवान स्वयंभू 1 साल तक रहे थे। उस अंडे के अंदर ही ब्रह्मा जी ने ध्यान लगा कर गहन चिंतन व कल्पना करके उस अंडे के दो टुकड़ों मैं विभाजित कर दिया। जब अंडे के दो टुकड़े हो गए तब उन टुकड़ों से स्वर्ग आदि लोकों का निर्माण हुआ।

ताभ्यां  स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं  च निर्ममे।
मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां  स्थानं च शाश्वतम् ।श्लोक  13।।

हिंदी अर्थ-  “मनुस्मृति” ग्रन्थ के रचनाकार स्वायम्भूव मनु ऋषियों के सम्मुख जगत् की सृष्टि के बारे में बताते  है कि  सृष्टिकर्ता  ब्रह्मा ने एक वर्ष तक उस स्वर्णमय अण्डे में रहकर ध्यान किया एवं उस विराट अण्डे को दो भागो में विभाजित किया। विभाजित हुये अण्डे के दो टुकड़ों से ब्रह्मा ने  ऊपर वाले भाग से स्वर्गलोक , मध्यभाग से अन्तरिक्ष लोक एवं नीचे वाले भाग से पृथ्वीलोक का निर्माण किया।

अर्थात् सत्वगुणरूपी स्वर्ग एवं तमोगुणरुपी भूलोक के बीच रजोगुणरुपी अन्तरिक्ष का निर्माण हुआ।  इसके साथ-साथ उस परमपिता ब्रह्मा ने उसी अण्डे से फिर पूर्वादि अष्ट दिशाओं का एवं समुद्र आदि का निर्माण भी किया। (शेषभाग पीडीएफ़ में है।)

Manusmriti in Sanskrit with Hindi Translation PDF Free Download

Some Important Slokas of Manusmriti –

पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकांछठान्।
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाड्मात्रेणापि नार्चयेत्।।

हिन्दी अर्थ- पाखंडी, बुरे कर्म करने वाला, दूसरों को बेवकूफ बनाकर उनका धन ठगने वाला, दूसरों को दुख पहुंचाने वाला और  वेदों में श्रद्धा न रखने वाला. इन 5 प्रकार के लोगों को अपना अतिथि नहीं बनाना चाहिए. और इनसे जल्द-से-जल्द छुटकारा पाने की कोशिश करनी चाहिए।

स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः।।

हिन्दी अर्थ- सुंदर स्त्री, रत्न, ज्ञान, धर्म, पवित्रता, उपदेश और अलग-अलग  प्रकार के शिल्प ये चीजें, जहाँ कहीं भी, जिस किसी से भी मिलती हो पाने की कोशिश करनी चाहिए।

मृगयाक्षदिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियों मदः।
तौर्यत्रिकं वृथाद्या च कामजो दशको गणः।।

हिन्दी अर्थ- शिकार खेलना, जुआ खेलना, दिन में भी कोरे सपने देखना,  परनिंदा करना, स्त्रियों के साथ रहना, शराब पीना, नाचना, श्रृंगारिक कविताएं या गीत गाना, बाजा बजाना, बिना किसी उद्देश्य के घूमना. ये 10 बुरी आदतें काम भावना के कारण जन्म लेती है. इसलिए हमें काम से बचकर रहना चाहिए।

पैशुन्यं साहसं मोहं ईर्ष्यासूयार्थ दूषणम्।
वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोपिगणोष्टकः।।

हिन्दी अर्थ- चुगली करना, जरूरत से ज्यादा साहस, द्रोह, ईर्ष्या करना,  दूसरों में दोष देखना, दूसरों के धन को छीन लेना, गलियाँ देना, और  दूसरों से बुरा व्यवहार करना. ये 8 बुरी आदतें क्रोध से उत्पन्न होती है, इसलिए हमें क्रोध को नियन्त्रण में रखना चाहिए।

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

हिन्दी अर्थ- यज्ञ करने वाले, पुरोहित, आचार्य, अतिथि, माता, पिता, मामा आदि संबंधियों, भाई, बहन, पुत्र, पुत्री, पत्नी, पुत्रवधू, दामाद और नौकरों से बहस नहीं करना चाहिए।

Manusmriti Chapter 5 Law of Karma

  • ऋतुकाल में स्त्री पुरुषों को संबंध नहीं बनाना चाहिए, और बताया गया है कि स्त्री पुरुषों को काम भावना पर नियंत्रण रखना चाहिए और बहुत अधिक संबंध बनाने से बचना चाहिए।
  • अपना जूठा भोजन किसी को नहीं देना चाहिए, ठहर-ठहर कर भोजन नहीं करना चाहिए, अधिक भोजन नहीं करना चाहिए और जूठे मुँह कहीं नहीं जाना चाहिए।
  • जो व्यक्ति अपने से बड़ों को प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है. उसकी आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।
  • जिन चीजों से स्वाध्याय में बाधा पड़े, उन चीजों को छोड़ देना चाहिए।
  • जब अतिथि घर में आ जाए, तो उसे भोजन करवाने के बाद हीं भोजन करना चाहिए।
  • उदय होते समय, अस्त होते समय और ग्रहण के समय सूर्य को नहीं देखना चाहिए।
  • जिस रस्सी से गाय बंधी हो, उसे नहीं लांघना चाहिए।
  • जब वर्षा हो रही हो, उस वक्त रास्ते में नहीं दौड़ना चाहिए।
  • किसी भी पुरुष को अपने से अधिक उम्र वाली स्त्री से सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए, जो पुरुष ऐसा करता है, उसका तेज, आयु और बल कम होता है।
  • बिल्कुल सुबह या शाम को भोजन नहीं करना चाहिए।
  • दूसरे के पहने हुए कपड़े या जूते इत्यादि नहीं पहनने चाहिए।
  • सुबह की धूप में नहीं बैठना चाहिए, ऐसा करना अच्छा नहीं होता है।
  • जहाँ बहस या लड़ाई हो रही हो, वहाँ नहीं जाना चाहिए।
  • कभी भी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।
  • अगर किसी बुरे व्यक्ति की तरक्की, बुरे कर्मों से हो रही हो, तो भी यह देखकर भी बुरे कर्म नहीं करने चाहिए।
  • अपमान से दिया गया अन्न और बुरे व्यक्ति द्वारा दिया गया अन्न कभी नहीं खाना चाहिए।

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