कोकिला व्रत की कथा | Kokila Vrat Katha PDF in Hindi

कोकिला व्रत की कथा | Kokila Vrat Katha Hindi PDF Download

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कोकिला व्रत की कथा | Kokila Vrat Katha Hindi PDF Summary

नमस्कार पाठकों, इस लेख के माध्यम से आप कोकिला व्रत की कथा PDF / Kokila Vrat Katha in Hindi PDF प्राप्त कर सकते हैं।  आषाढ़ पूर्णिमा के दिन किए जाने व्रत को कोइला व्रत के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कोकिला व्रत को बहुत महत्वपूर्ण व फलदायी माना जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान भोलेनाथ शिव को अपने पति रूप में प्राप्त करने के लिए कोयल के रूप में अनेक वर्षों तक कठिन तप किया था।

यदि आपके दाम्पत्य जीवन में किसी भी प्रकार की उथल – पुथल चल रही और आप अनेक प्रकार के उपाय अपना चुके हैं तो आपको पूर्ण विधि – विधान से कोकिला व्रत का पालन करना चाहिए। यदि आप इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा – भक्ति से करते हैं तो आपके जीवन में प्रेम एवं सौहार्द का वातावरण निर्मित होता है। जो भी कन्याएँ सुयोग्य वर की प्राप्ति करना चाहती हैं उन्हें इस व्रत के परिणामस्वरूप इच्छित वर की प्राप्ति होती है।

कोकिला व्रत की कथा PDF / Kokila Vrat Katha in Hindi PDF

कोकिला व्रत की कहानी का संबंध शिव पुराण में भी प्राप्त होता है। कथा इस प्रकार है ब्रह्माजी के मानस पुत्र दक्ष के घर देवी सती का जन्म होता है। दक्ष विष्णु का भक्त थे और भगवान शिव से द्वेष रखते थे। जब बात सती के विवाह की होती है, तब राजा दक्ष कभी भी सती का संबंध भगवान शिव से जोड़ना नहीं चाहते थे।

राजा दक्ष के मना करने पर भी सती ने भगवान शिव से विवाह कर लिया था। पुत्री सती के इस कार्य से दक्ष इतना क्रोधित होते हैं कि वह उससे अपने सभी संबंध तोड़ लेते हैं। कुछ समय बाद राजा दक्ष शिवजी का अपमान करने हेतु एक महायज्ञ का आयोजन करते हैं। उसमें दक्ष ने अपनी पुत्री सती और दामाद भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था।

देवी सती को जब अपने पिता के इस कार्य का बोध होता है तो वह उस यज्ञ में जाने के लिए तैयार होती हैं भगवान शिव उन्हें इस बात की इजाज़त नहीं देते, पर देवी सती की जिद के आगे हार जाते हैं और उन्हें जाने देते हैं। सती यज्ञ पर जाकर जब अपने पति का स्थान नहीं पाती तो अपने पिता दक्ष से इस बारे में पूछती हैं लेकिन दक्ष अपनी पुत्री सती और शिव का अपमान करते हैं।

शिव के प्रति अपमान के शब्दों को वह सहन नहीं कर पाती हैं और उस यज्ञ के हवन कुंड में अपनी देह का त्याग कर देती हैं। भगवान शिव को जब पता चलता है तो वह दक्ष और उसके यज्ञ को नष्ट कर देते हैं। शिव सती के वियोग को नहीं सह पाते हैं और उनकी इच्छा के विरुद्ध जाकर यज्ञ की अग्नि में कूदकर प्राणों को त्यागने पर उन्हें हजार वर्षों तक कोयल बनने का शाप देते हैं।

देवी सती कोयल बनकर हजारों वर्षों तक भगवान शिव को पुन: पाने के लिए तपस्या करती हैं। उनकी तपस्या का फल उन्हें पार्वती रूप में शिव की प्राप्ति के रूप में मिलता है। तब से कोकिला व्रत की महत्ता स्थापित होती है।

कोकिला व्रत की पूजा विधि / Kokila Vrat Ki Puja Vidhi PDF

  • व्रत करने वाले को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नापन करना चाहिए।
  • इस दिन गंगा स्नाेन करें तो सबसे अच्छा होता है।
  • स्नाछन के बाद सूर्य को अर्घ्यम देकर दिन का आरंभ करें।
  • उसके बाद माता पार्वती और शिवजी की पूजा करें।
  • शिवजी का दूध और गंगाजल से अभिषेक करें।
  • शिवजी की पूजा में सफेद और लाल पुष्पू के अलावा बेलपत्र, भांग, धतूरा, दूर्वा, अष्टगंध, धूप और दीपक रखें।
  • इन सभी वस्तु ओं से पूजा करने के बाद व्रत का संकल्प। लें।
  • आप चाहें तो निराहार व्रत रहें और समार्थ्य नहीं है तो फलाहार करके भी व्रत रहा जा सकता है।
  • व्रत रखने वाले व्यमक्ति को इस दिन कोकिला व्रत की व्रत कथा जरूर पढ़नी चाहिए।
  • दिन भर व्रत रहने बाद सूर्यास्तक के वक्ता शिवजी की आरती और पूजा करें।
  • उसके बाद भोग लगाएं।
  • शाम की पूजा के बाद आप फलहार ग्रहण कर सकते हैं।

कोकिला व्रत का महत्‍व / Significance of Kokila Vrat

  • कोकिला व्रत की ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है।
  • यह दांपत्य जीवन को खुशहाल होने का वरदान प्रदान करता है।
  • इस व्रत के द्वारा मन के अनुरूप शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
  • शादी में आ रही किसी भी प्रकार की दिक्कत हो तो इस व्रत का पालन करने से विवाह सुख प्राप्त होता है।
  • यह व्रत योग्य वर की प्राप्ति कराने में सहायक बनता है।
  • आषाढ़ पूर्णिमा के दिन रखा गया यह व्रत संपूर्ण सावन में आने वाले व्रतों का आरंभ माना जाता है।
  • इस व्रत में देवी के स्वरूप को कोयल रूप में पूजा जाता है।
  • कहा जाता है कि माता सती ने कोयल रूप में भगवान शिव को पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी।
  • उनकी तपस्या के शुभ फल स्वरूप उन्हें पार्वती रूप मिला और जीवनसाथी के रूप में भगवान शिव की प्राप्ति होती है।

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कोकिला व्रत की कथा | Kokila Vrat Katha pdf

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