दीवानों की हस्ती पाठ का भावार्थ PDF in Hindi

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दीवानों की हस्ती पाठ का भावार्थ in Hindi

हेलो बच्चों! आज हम आपके लिए लेकर आएं हैं Class 8 Hindi Chapter 4 PDF in Hindi / दीवानों की हस्ती पाठ का भावार्थ PDF। इस पीडीएफ में आप अंग्रेजी भाषा में कक्षा 10वीं के सभी शार्ट और लॉन्ग प्रश्न उत्तर, नोट्स, एनसीईआरटी समाधान आदि पढ़ेंगे। हमने 10वीं कक्षा की परीक्षाओं में उच्चतम अंक प्राप्त करने में आपकी सहायता के लिए यह पीडीएफ अपलोड किया है। नीचे हमने Deewano Ki Hasti Path Ka Bhavarth PDF / दीवानों की हस्ती पाठ का भावार्थ PDF के लिए डाउनलोड लिंक प्रदान किया है।

दीवानों की हस्ती पाठ का भावार्थ PDF

हम दीवानों की क्या हस्ती,
हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले,
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले।
दीवानों की हस्ती भावार्थ : दीवानों की हस्ती कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि दीवानों की कोई हस्ती नहीं होती। अर्थात, वो इस घमंड में नहीं रहते कि वो बहुत बड़े आदमी हैं और ना ही उन्हें किसी चीज़ की कमी का कोई मलाल होता है। कवि ख़ुद भी एक दीवाने हैं और बस अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं। उनकी इस मस्ती और ख़ुशी के आगे ग़म टिक नहीं पाता है और धूल की तरह उड़न-छू हो जाता है।

आए बन कर उल्लास अभी,
आँसू बन कर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए, अरे,
तुम कैसे आए, कहाँ चले?
दीवानों की हस्ती भावार्थ : दीवानों की हस्ती कविता की इन पंक्तियों में कवि ने कहा है कि दीवाने-मस्तमौला लोग जहाँ भी जाते हैं, वहाँ का माहौल ख़ुशियों से भर जाता है। फिर जब वो उस जगह से जाने लगते हैं, तो सब काफी दुखी हो जाते हैं। लोगों को उनके जाने का पता तक नहीं चलता। वो तो मन में ही अफ़सोस करते रह जाते हैं कि उन्हें मालूम ही नहीं हुआ, कवि कब आए और कब चले गए।

इस प्रकार कवि कह रहे हैं कि एक जगह टिककर रहना उनका स्वभाव नहीं है, उन्हें घूमते रहना पसंद है। इसीलिए वो अक्सर अलग-अलग जगह आते-जाते रहते हैं।

किस ओर चले? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले,
दीवानों की हस्ती भावार्थ : दीवानों की हस्ती कविता में आगे कवि कहते हैं कि मुझसे मत पूछो में कहाँ जा रहा हूँ। मुझे तो बस चलते रहना है, इसीलिए मैं चले जा रहा हूँ। मैनें इस दुनिया से कुछ ज्ञान प्राप्त किया है, अब मैं उस ज्ञान को बाकी लोगों के साथ बाँटना चाहता हूँ। इसलिए मुझे निरंतर चलते रहना होगा।

दो बात कही, दो बात सुनी।
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए।
छककर सुखदुख के घूँटों को
हम एक भाव से पिए चले।
दीवानों की हस्ती भावार्थ : भगवती चरण वर्मा दीवानों की हस्ती कविता की इन पंक्तियों में कह रहे हैं कि वो जहाँ भी जाते हैं, लोगों से ख़ूब घुलते-मिलते हैं, उनके सुख-दुख बांटते हैं। कवि के लिए सुख और दुख, दोनों भावनाएं एक समान हैं, इसलिए, वो दोनों परिस्थितियों को शांत रहकर सहन कर लेते हैं।

इस तरह, कवि अपने मार्ग पर चलते हुए, लोगों का दुख-सुख बाँटते हैं और उन्हें एक समान ढंग से ग्रहण करके आगे बढ़ जाते हैं।

हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले,
हम एक निसानीसी उर पर,
ले असफलता का भार चले।
दीवानों की हस्ती भावार्थ : दीवानों की हस्ती कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि ये दुनिया बड़ी ही स्वार्थी है। लोग स्वार्थ में इतने अंधे हैं कि बस भिखमंगों की तरह सबसे कुछ ना कुछ माँगते ही रहते हैं। मगर, कवि स्वार्थी नहीं हैं, इसलिए उन्होंने स्वार्थी दुनिया पर बिना किसी शर्त के अपना अनमोल प्यार लुटाया है। लोगों को प्यार बाँटने का खूबसूरत एहसास हमेशा कवि के दिल में रहता है।

उन्होंने जीवन में काफी बार असफलता और हार का स्वाद भी चखा है, लेकिन इसका बोझ उन्होंने कभी किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं डाला। इस तरह कवि ने स्वार्थी दुनिया को भरपूर प्यार दिया और अपनी नाकामयाबी का भार हमेशा स्वयं ही उठाया है।

अब अपना और पराया क्या?
आबाद रहें रुकने वाले!
हम स्वयं बँधे थे और स्वयं
हम अपने बँधन तोड़ चले।
दीवानों की हस्ती भावार्थ : दीवानों की हस्ती कविता की इन अंतिम पंक्तियों में कवि कहते हैं कि अब उनके लिए दुनिया में कोई भी अपना या पराया नहीं है। जो लोग एक मंज़िल पाकर, वहीं ठहर जाना चाहते हैं, उन्हें कवि ने सुखी और आबाद रहने का आशीर्वाद दिया है। मगर, कवि ख़ुद एक जगह बंध कर नहीं रहना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने अपने सभी सांसारिक बंधन तोड़ दिये हैं और अब वो अपने चुने हुए मार्ग पर आगे बढ़ते जा रहे हैं। वो इसी में ख़ुश और संतुष्ट हैं।

दीवानों की हस्ती पाठ का सारांश

प्रस्तुत कविता में कवि का मस्त-मौला और बेफिक्री का स्वभाव दिखाया गया है । मस्त-मौला स्वभाव का व्यक्ति जहां जाता है खुशियाँ फैलाता है। वह हर रूप में प्रसन्नता देने वाला है चाहे वह ख़ुशी हो या आँखों में आया आँसू हो। कवि ‘बहते पानी-रमते जोगी’ वाली कहावत के अनुसार एक जगह नहीं टिकते। वह कुछ यादें संसार को देकर और कुछ यादें लेकर अपने नये-नये सफर पर चलते रहते हैं।
वह सुख और दुःख को समझकर एक भाव से स्वीकार करते हैं। कवि संसारिक नहीं हैं वे दीवाने हैं। वह संसार के सभी बंधनों से मुक्त हैं। इसलिए संसार में कोई अपना कोई पराया नहीं है।जिस जीवन को उन्होने खुद चुना है उससे वे प्रसन्न हैं और सदा चलते रहना चाहते हैं।

दीवानों की हस्ती पाठ की व्याख्या

दीवानों की हस्ती

हम दीवानों की क्या हस्ती,
हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले,
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले।
आए बन कर उल्लास अभी,
आँसू बन कर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए, अरे,
तुम कैसे आए, कहाँ चले?

दीवानों: अपनी मस्ती में रहने वाले
हस्ती: अस्तित्व
मस्ती: मौज
आलम: दुनिया
उल्लास: ख़ुशी

अपनी मस्ती में रहने वाले लोगों की क्या हस्ती, क्या अस्तित्व है।  कभी यहाँ है तो कभी वहाँ । एक जगह तो रूकने वाले नहीं है, आज यहाँ, कल वहाँ चले । यानी की जो मस्त-मौला किस्म के व्यक्ति हैं वो कभी भी एक जगह नहीं ठहरते, आज यहाँ है तो कल कहीं और। यह जो मौज मस्ती का आलम है यह साथ चला-  जहाँ कवि गया वहाँ पर उन्होंने अपनी मस्ती से, अपनी प्रसन्नता से, सब में खुशियाँ बाँटी। कवि कहते हैं कि हम अपनी मस्त-मौला आदत के अनुसार जहाँ भी गए, प्रसन्नता से धूल उड़ाते चले, मौज मजा करते चले।  हम दीवानों की हस्ती कुछ ऐसी ही होती है हम जहाँ भी जाते है अपने ढंग से जीते है अपने ढंग से ही चलते-चलते है । हम पर किसी का कोई असर नहीं होता। कवि कहते है  वे अभी-अभी आएँ है और खुशियाँ बाँटी हैं, खुशियाँ लुटाई है और अभी कुछ हुआ कि आँसू भी बनकर बहे निकले।अर्थात् अभी-अभी खुश थे और अभी-अभी दुखी हो गए है तो आँसू भी बह निकले है । कवि मस्त-मौला किस्म के है अपने मन मरजी के मालिक हैं कभी कहीं जाते है तो कभी कहीं के लिए चल पड़ते है तो जहाँ पर पहुँचते है खुशियाँ लुटाते है और वहाँ से आगे निकल चलते है तो लोग कहते है कि अरे, तुम कब आए और कब चले गए पता ही नहीं चला।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठय पुस्तक “वसंत-3” में संकलित कविता “दीवानों की हस्ती” से ली गयी है। इसके कवि “भगवती चरण वर्मा“ है। इस कविता में कवि ने मस्त-मौला और फक्कड़ स्वभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या – इसमें कवि कहते हैं कि उनका स्वभाव मस्त-मौला है, वह एक स्थान पर टिके नहीं रहते। वे जहाँ भी जाते हैं, चारों तरफ खुशियाँ फैल जाती है। कवि जहाँ धूल उड़ाते हुए जाते है वही चारों तरफ प्रसन्नता का माहौल हो जाता है। कवि रमता जोगी है। वह मन में उत्पन्न भावों की भाँति कभी ख़ुशी का सन्देश तो कभी आँखों में बहते आँसू की तरह सब जगह फ़ैल जाता है। कवि कहते हैं कि वे इतनी जल्दी आते जाते रहते हैं की लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे कब आए और कब चले गए।

किस ओर चले? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले,
दो बात कही, दो बात सुनी।
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए।
छककर सुख-दुख के घूँटों को
हम एक भाव से पिए चले।

जग: संसार
छककर: तृप्त होकर
भाव: एहसास

कवि कहते हैं कि यह मत पूछो  कि मैं कहाँ जा रहा हूँ मेरी मंजिल क्या है क्योंकि इसके बारे में तो मुझे भी नहीं पता स्वयं को भी नहीं पता। जैसा कि मैं मस्त-मौला हूँ, एक जगह ठहरता नहीं हूँ, चलता ही रहता हूँ इसलिए बस आगे चलते ही रहना है। इस दुनिया से कुछ ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया है , कुछ सीख ली है , उसको लेकर वह आगे बढ़ चले है। जो भी उनके पास था वे भी इस दुनिया के साथ बाँटते हुए आगे चल पड़े है। कवि जहाँ कहीं भी पहुँचे वहाँ के लोगों से खुशी-खुशी से मिले और उनसे बात चीत की, अपना सुख-दुख बाँटा और अपने मन की बात कही। जब सुख के भाव जगे तो उनके साथ मिलकर हँसे भी और जब उनको दुख का अनुभाव हुआ तो उनके साथ अपना दुख भी बाँटा । उनका भी सुख-दुख बाँटा। जो दुख-सुख के समय भावनाएँ जगी,  उनको एक दूसरे के साथ बाँटा जिससे व्यक्ति का मन हल्का हो जाता है। जो सुख-दुख के भाव है एक सामान हम गमों से पिए चले और आगे बढे़ चले।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठय पुस्तक “वसंत-3″ में संकलित कविता” दीवानों की हस्ती” से ली गयी है। इसके कवि “भगवती चरण वर्मा” है। इस काव्यांश में कवि संसार से दूर अपनी अलग राह पर चलने की बात कह रहे हैं।

व्याख्या- संसार जब कवि से जानना चाहता है अब वो किस ओर जा रहे हैं तो वे कहते हैं कि ये मत पूछो कि मैं कहाँ जा रहा हूँ क्योंकि मेरी कोई निश्चित मंजिल नहीं है। मैं चलता हूँ क्योंकि यह मेरा स्वभाव है। कवि कहते हैं कि वो संसार से कुछ ज्ञान लेकर और कुछ अपने पास से देकर जा रहे हैं। कवि का स्वभाव चलने का है परन्तु वह जहां रुकते हैं वहां लोगों से प्रेम भरी बातें करते हैं तथा उनकी बातें सुनते हैं और उनसे अपना तथा उनका सुख-दुख बाटतें हैं तथा सुख-दुःख रूपी अमृत का घूँट पीकर वह फिर नये सफर पर चल देते हैं।

हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले,
हम एक निसानी – सी उर पर,
ले असफलता का भार चले।
अब अपना और पराया क्या?
आबाद रहें रुकने वाले!
हम स्वयं बँधे थे और स्वयं
हम अपने बँधन तोड़ चले।

भिखमंगों: भिखारियों
स्वच्छंद: आजाद
निसानी: चिन्ह
उर: ह्रदय
असफलता: जो सफल न हो
भार: बोझ
आबाद: बसना
स्वयं: खुद

कवि इन पंक्तियों में कह रहे है कि यह जो दुनिया है, दुनिया के लोग भिखारियों की तरह कुछ न कुछ माँग करते रहते है । भिखारी की आदत माँगना होती है  । इस दुनिया के लोगों को उन्होंने भिखमंगे कहा है । भिखमंगों की इस दुनिया में अपनी मन मरजी से अपना प्यार लुटाकर चले है। वे अपने हृदय में यही एक निशानी लेकर आगे चले है ।  उन्होंने जीवन में असफलता भी  पाई  है, हार भी मानी है, लेकिन उस का बोझ स्वयं ही उठाया है। उसका बोझ किसी पर नहीं डाला है अर्थात उसके लिए जिम्मेदार किसी अन्य व्यक्ति को नहीं मानते हैं ।  जो अपनी मंजिल पर रूके है वह आबाद रहे, बसे रहे यही आर्शीवाद देते है। कवि कहते है कि हम स्वयं ही अपने इन बँधनों में बँधे थे, अपनी स्वतत्रंता से, अपनी मरजी से, और हम स्वयं ही यह बँधन  तोड़ आगे चल निकले है। कवि का यह मानना है कि वे संकल किस्म के मस्त-मौला आदमी दीवाने कभी किसी बँधन में नहीं बँधे है । अगर बँधे है तो वह अपनी मरजी से और अब वो आगे बढ़ निकले है अर्थात् बँधनों को तोड़ चले है तो भी वे अपनी मन मरजी से ही उन बँधनों को तोड़कर आगे बढ़े है । वह स्वयं ही इस बात का अफसोस जताते है अपने जीवन में इस बात की हार मानते है कि वे कभी भी एक संसारिक व्यक्ति नहीं बन पाए, एक संसारिक व्यक्ति का सुख नहीं भोग पाए ।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठय पुस्तक “वसंत-3” में संकलित कविता “दीवानों की हस्ती” से ली गयी है। इसके कवि “भगवती चरण वर्मा” है। इस काव्यांश में कवि प्यार की दौलत से हीन संसार को भिखारी कहते हैं और फक्कड़ होते हुए भी वे संसार पर अपना प्यार लुटाते हैं।

व्याख्या – कवि के अनुसार ये संसार भिखारी है इसके पास प्रेम नामक धन नहीं है। किन्तु कवि पूरी आजादी से सब जगह प्रेम लुटाते चलते हैं क्योंकि कवि सारे संसार को अपना मानते हैं इसीलिए वे बंधन मुक्त हैं। इतना प्रेम होते हुए भी एक सफल संसारिक व्यक्ति न बन पाने की दर्दया निशानी उनके ह्रदय में है और यही भार उनकी असफलता है। कवि के अनुसार संसार में कोई अपना और कोई पराया नहीं है। वे कहते हैं वे स्वयं इन बंधनों में बंधे थे और स्वयं इन बंधनों को तोड़कर आगे चलते जा रहे हैं तथा इससे वे प्रसन्न हैं और सदा चलते रहना चाहते हैं।

दीवानों की हस्ती पाठ के प्रश्न उत्तर

प्र॰1 कवि ने अपने आने को ‘उल्लास’ और जाने को ‘आँसू बन कर बह जाना’ क्यों कहा है? 

उत्तर – कवि खुद के आने को उल्लास इसलिए कहते हैं क्योंकि वे जहाँ भी जाते हैं खुशियाँ फैलाते हैं तथा अपने जाने को आंसू बनकर बह जाना इसलिए कहते हैं क्योंकि इतनी खुशियों के बाद जब वो जाते हैं तो उनकी याद में लोगों को आँसू आने लगते हैं।

प्र॰2 भिखमंगों की दुनिया में बेरोक प्यार लुटाने वाला कवि ऐसा क्यों कहता है कि वह अपने हृदय पर असफलता का एक निशान भार की तरह लेकर जा रहा है? क्या वह निराश है या प्रसन्न है?

उत्तर – कवि प्रेम की दौलत संसार में लुटाता है। इतना प्रेम होने पर भी वह अपने को असफल इसलिए कहता है क्योंकि वह कभी सांसारिक व्यक्ति नहीं बन पाया। यही असफलता उसके ह्रदय में एक निशाँ की तरह चुभती है। किन्तु वो निराश नहीं है वह प्रसन्न है क्योंकि यह रास्ता उसने खुद चुना है और वह इसके लिए किसी को दोषी भी नहीं ठहराता है।

प्र॰3 कविता में ऐसी कौन-सी बात है जो आपको सब से अच्छी लगी?

उत्तर इस कविता में कवि का अपने ढंग से अपना जीवन जीना तथा चारों ओर प्यार और खुशियाँ बाँटना सबसे अच्छा लगा। कवि अपने जीवन की असफलता के लिए किसी अन्य को दोषी नहीं ठहराता यह भी अच्छा लगा।

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